Tuesday, December 7, 2010

Bhabhi

हम सभी बच्चे घर के बाहर मैदान मे क्रिकेट खेल रहे थे। खेल के बीच मे मै भाग कर घर मे आ गया और एक तरफ़ चार दीवारी मे दीवार के पास सू सू करने लगा। मुझे नही पता था कि मुझे भाभी रसोयी की खिड़की मे से मुझे सू सू करते हुये घूर घूर कर देख रही थी। मेरी नजर ज्योही उधर गयी, भाभी ने मुझे मुस्करा कर देखा। भाभी तो उस समय चौबीस वर्ष की थी। शादी हुये तीन साल हो गये थे। वो अभी भी जीन्स पहनती थी, जिसमे से उनके गोल कसे हुये चूतड़ बड़े ही मोहक लगते थे। दिन को जब मैं भोजन पर घर आया तो भाभी ने मुझे बुला लिया। वो मुझे मुस्कराती हुयी कहने लगी
"अभी तो तुम सिर्फ़ चौदह साल के हो और बहुत शैतानी करने लगे हो"
"पर मैने तो कुछ भी नही किया …" मैने बहुत सादगी से कहा
"तुम्हारी जेब मे क्या है, इधर तो आओ" भाभी ने मुझे अंगुली से इशारा किया
"कुछ नही है भाभी, सच मे"
पर भाभी ने मेरी बांह पकड़ कर अपनी ओर खींच लिया। मुझे जरा भी समझ मे नहीं आया कि भाभी मेरी जेबें क्यो देखना चाहती है। उन्होने मेरी जेब मे हाथ घुसा लिया और जेब टटोलने लगी। पर उनक हाथ तो मेरी सू सू से टकरा रहा था। मुझे एक अजीब सी गुदगुदी होने लगी थी। मेरी लुल्ली उनके स्पर्श से खड़ी होने लगी थी।
"ये क्या है बोलो, डण्डा छिपा रखा है, बोलो" भाभी ने मेरी लुल्ली पकड़ ली।
"भाभी, ये डण्डा नही है, ये तो मेरी लुल्ली है"
"इतनी बड़ी … झूठ !"
"सच, ये लुल्ली ही है" मुझे गुदगुदी होने से अच्छा लगने लगा था।
"चल रे झूठा, अच्छा जरा निकाल कर दिखा तो"
"ओ भाभी, पहले खाना तो दे दो, फिर आकर बता दूगा" मै भाग कर रसोयी मे आ गया। मुझ भाभी की ये हरकत बहुत अच्छी लगी थी। दिल मे रोमांच भर आया था। मैं भोजन करके वापस खेलने चला गया। पर अब मेरा दिल खेलने मे नहीं लग रहा था। मै बार बार रसोयी की तरफ़ देख रहा था। तभी खिड़की पर मुझे भाभी की एक झलक मिली। मैं भाग कर फिर वहीं सू सू करने आ गया। भाभी मुझ खिड़की से फिर घूर घूर कर देखने लगी। इस बार मैने सू सू का थोड़ा सा एण्ग़ल बदल कर भाभी की ओर कर दिया था ताकि उन्हे मेरी सू सू पूरी दिख जाये। एसा करते हुए मेरी सू सू खूब कड़ी हो गयी थी। फिर मै वापस खेलने चला गया। पर मेरा मन तो भाभी की हरकतो पर था। मुझे अधिक समझ तो नहीं थी पर मुझे ये सब अजीब पर मनभावन सा लग रहा था। मन कर रहा था कि दौड़कर भाभी के पास चला जाऊ।
फिर कुछ देर बाद मै खेल छोड़ कर घर आ गया। भाभी तो घर के कपड़े पहने हुये थी। बस एक गाऊन डाल रखा था उन्होने। वो मुझे देखते ही खुश हो गयी। मै दौड़ कर उनके साथ सोफ़े पर बैठ गया।
"तुने मुझे अपनी लुल्ली नही दिखायी रे नन्दू" भाभी ने छूटते ही पूछा
"शरम आती है ना भाभी" मैने भाभी की गोदी मे अपना चेहरा छिपा लिया
"अरे चल मर्द थोड़े ही ना शर्माते है, चल पेण्ट उतर कर बता तो" भाभी की नीयत मुझ पर खराब होती जा रही थी। भाभी ने मेरी हाफ़ पेण्ट की बटन खोल दी और पेण्ट नीचे खींचने लगी। मैने जान कर के कोई विरोध नही किया। मेरी लुल्ली बाहर निकल आयी।
"हाय राम नन्दू! तेरी लुल्ली है या लुल्ला, इतनी बड़ी" वो तो मेरी लुल्ली पर मोहित सी हो गयी।
"इसको बड़ी कहते है क्या ? " मुझे भी ये सुन कर आश्चर्य हुआ। भाभी ने मेरी लुल्ली को छू लिया और थोड़ा सा हिला दिया। मेरी लुल्ली एक दम तन गयी। यू तो मेरी लुल्ली कई बार खड़ी हो जाती थी पर आज उसमे एक मीठी सी उत्तेजना थी।
"भाभी, ऐसे करने से तो बहुत मजा आता है, और करो ना"
"देख किसी को कहना नहीं, लुल्ली के तो बहुत से खेल है और पता है नन्दू ,बहुत मजा आता है"
"सच भाभी, तब अपन चुपके चुपके से खेलेंगे, खूब मजा आयेगा ना" मैं भी बहुत उत्साह मे भर गया।
"देख लुल्ली को यू आगे पीछे करने से मजा आता है ना और देख शरमाना मत, तू कहेगा तो तुझे यहां से दुद्धू भी पिलाउंगी और… देख तुझे मेरी कसम है … किसी को ना कहना" भाभी को थोड़ा सा संकोच हो आया।
"तो मुझे दुद्धू पिलाओ … कैसे पीते है"
"देख एक हाथ से इस दुद्धू को अंगुलियो से ऐसे ऐसे मलना और अपने मुख से दूसरे वाले को खींच खींच कर पीना"
"अरे वाह, ऐसे तो खूब मजा आयेगा"
भाभी ने अपना गाऊन सामने से खोल दिया और सोफ़े पर से मुझे अपनी छाती की ओर खींच लिया। उनके नरम बोबे मेरे चेहरे पर रगड़ से मार गये और फिर उन्होने मेरा एक हाथ दायी चूंची पर रख दिया और बायीं चूंची मेरे मुख मे डाल दी। मैं बोबे को जितना चूसता, उतना ही वो सी सी करती। फिर भाभी ने मुझे सोफ़े से उठा कर अपनी बायीं जांघ पर बैठा लिया और मेरा लण्ड पकड़ लिया। मेरा लण्ड किसी अनजाने सुख से बहुत कड़कने लगा था। उन्होने मेरे लण्ड को धीरे धीरे आगे पीछे करके मुठ मारने लगी। इस अनोखे आनन्द से उसके दुद्धू मेरे मेरे मुख से निकल गये। आनन्द के मारे मै सिसकिया लेने लगा। मुझ पर मस्ती चढते देख कर भाभी ने मुठ मारने की गति तेज कर दी। अनन्द के मारे मैं तो दोहरा होने लगा। मुझे आनन्दित देख कर उनका जोश भी बढ गया। वो मुझे प्यार करती हुयी, मुझे लिपटाती हुयी बड़ी कोमलता से जल्दी जल्दी हाथ चलाने लगी।
"अह्ह्ह, भाभी, मुझे कुछ हो रह है, मेरा पेशाब निकलने वाला है … जरा रुको मै मूत कर आता हू"
"मजा आ रहा है ना, यही मूत देना …"
वो अब मेरा लण्ड दबा दबा कर लण्ड को आगे पीछे करके मुठ मार रही थी। तभी रोकते रोकते भी मेरे लण्ड से एक फ़ुहार निकल पड़ी। मेरा लण्ड जोर जोर से पिचकारी छोड़ने लगा। भाभी लण्ड को हाथ मे लेकर मेरा वीर्य निकालने मे लगी रही। फिर जैसे तूफ़ान गुजर गया था। मैं भाभी की जांघ पर बैठा हुआ, ओर जोर की सांसे भर रहा था। ये मेरा जिन्दगी क पहला स्खलन था। किसी ने मुझे पहली बार मस्ती का ये नया तरीका बताया था।
"मजा आया ना नन्दू … ऐसे ही मस्ती भरे और भी खेल है। पर देख शाम को नहा कर आना। मेरे साथ ही सोना"
"मम्मी तो मना कर देगी ना"
"वो मैं सब कर लूंगी, तू अब जाकर खेल"
पर मेरा मन अब खेलने मे नही लग रहा था। भाभी ने मां से कह दिया था कि भैया तो बाहर गये हुये है, नन्दू को उन्ही के कमरे मे सुला देना तो डर नहीं लगेगा। भला उन्हे क्या आपत्ति थी।
रात को मै नहा धो कर भाभी के पास चला आया। भाभी ने कमरे की लाईट बुझा दी और मुझे अपने साथ सुला लिया। भाभी ने तो गाउन अन्धेरे मे उतर एक तरफ़ रख दिया।
"भाभी, आप तो बिलकुल नंगी हो गयी"
उन्होने मेरे होंठो पर अंगुली रख दी
"श्… श … कोई सुन लेगा, धीरे बोल, अरे अंधेरे मे कौन देखता है, तू भी उतार ले, फिर खेलेंगे"
मैने जल्दी से अपनी कमीज और हाफ़ पेण्ट उतार दी। अब मै भी नंगा था। मेरा किशोर शरीर, नरम और गुदाज था। मेरा लण्ड खड़ा हो गया। मै तो अपने आप ही भाभी की चूत की तरफ़ चिपकने सा लगा था। जाने क्यू ? शायद ये प्राकृतिक है, लण्ड अपना साथी तलाश रहा था। भाभी ने मुझे अपने नरम शरीर से चिपका लिया। उनके शरीर की भीनी भीनी सुगन्ध आने लगी थी। तभी मेरा लण्ड कही पर टकराया। भाभी ने मेरा लण्ड थाम कर उसका सुपाड़ा खोल दिया और जाने किस छेद मे, शायद सू सू मे कही घुसाने लगी। मेरी कमर लण्ड को उसके शरीर पर दबाने के लिये उस पर कसी जा रही थी। अब भाभी ने भी अपनी गीली और चूत मे लण्ड को पकड़ कर अपनी चूत मे भीतर सरका लिया। मुझे एक दम से लण्ड पर कुछ गीला गीला सा और चिकना सा अहसास हुआ। पर उसके भीतर सरकते जाने का अहसास बहुत ही मधुर था। तभी मैने जोश मे आकर और भाभी ने भी एक साथ अपनी अपनी कमर जोश मे चला दी। एक हल्की सी तीखी चुभन के साथ मेरा लण्ड बहुत अन्दर तक चला गया। जाने मजा आ रहा था या जलन सी हो रही थी। कुछ असमंजस की स्थिति थी। कुछ देर भाभी ने रुक कर मुझे चूमा चाटा। पर मैने उतावलेपने मे एक धक्का और दे दिया। मुझे फिर वही अजीब सी चुभन और जलन सी हुयी। पर भाभी मुझे इतने प्रेम से सहला रही थी कि मुझे वो जलन भी मजा दे रही थी। फिर धीरे धीरे भाभी ने मुझे अपने ऊपर ले लिया।
'नन्दू, अब मजा आयेगा, लुल्ली को अन्दर धक्का मार…"
मैने जलन के बारे मे उन्हे कुछ नही बताया पर शायद वो मेरी तकलीफ़ मेरे हाव भाव से जान गयी थी। मैने उसके ऊपर चढ कर भाभी को चोदना आरम्भ कर दिया था। उसकी सिसकिया तेज हो रही थी। मैं भी अब आनन्द से सरोबार हो गया था। मैं ऊपर चढा उसे तेजी से चोदने लगा था। दोनो ही वासना भरी मस्ती मे खो गये थे। कुछ देर बाद भाभी के मुख से एक हल्की सी चीख निकल गयी। वो झड़ गयी थी। तभी मै भी झड़ने लगा था।
उस रात भाभी ने मुझे तरह तरह के आसनो से चोदना सिखाया, गाण्ड भी दो बार मरवा ली। मेरी उभरती हुयी जवानी को बस निचोड़ कर रख दिया। उन्होने मेरे लण्ड को अपने मुख मे लेकर खूब चूसा, अपनी खुशबूदार चूत को भी मुझसे खूब चटवाया। अपने जिस्म को सभी तरह से नुचवाया मुझसे। उस दिन मै दिन के दस बजे तक सोता रहा।
अब तो भाभी हर रात मुझे खूब अनन्दित करती और खुद भी बहुत मजे करती। मै तो जैसे उनका गुलाम हो गया था। मै किशोरावस्था मे ही जवानी का खेल सीख गया था और मै एक नयी राह की ओर बढ चला था।

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